उत्तर प्रदेश में शहरीकरण

2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश, भारत का सर्वाधिक जनसंख्या (19.96 करोड़) वाला राज्य है, जिसमें से 15.51 करोड़ जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और 4.45 करोड़ जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में रहती है। 2001-2011 के बीच शहरी क्षेत्रों में 1.09 करोड़ आबादी की बढ़ोत्तरी हुई है। इस प्रकार, भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 16.50% प्रदेश में और 11.80% आबादी उत्तर प्रदेश के शहरों में रहती है। भारत के 4041 वैधानिक नगरों में 648 (16%) उत्तर प्रदेश में रहता है। प्रदेश की कुल जनसंख्या में से 22.28% शहरों में रहती है (2011 की जनगणना के अनुसार), जो 2011 में 20.78% थी, अर्थात 1.50 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। हालांकि, शहरीकरण का स्तर (22.28%) पूरे देश के अनुसार (31.16%) काफी कम है। 2001-2011 दशक की जनगणना के अनुसार शहरी की जनसंख्या 28.75 प्रतिशत है,जो 1991-2001 में 31.80 प्रतिशत थी। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि 2021 तक प्रदेश में शहरों की जनसंख्या 5.83 करोड़ हो जाएगी।

हालांकि, उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी नगर प्रणाली है, जिसमें 630 नगर पालिकाएं हैं, फिर भी यह नगरीकरण के मामले में 23वें स्थान पर है। प्रदेश के शहरीकरण के स्तर में काफी अनियमितताएं हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, पश्चिमी क्षेत्रों में 32.45% नगरीय जनसंख्या (सबसे अधिक) रहती है, वहीं पूर्वी क्षेत्रों में 13.40% जनसंख्या (सबसे कम) रहती है। केंद्र और बुंदेलखंड क्षेत्र की शहरी जनसंख्या 20.06 और 22.74 के अनुपात में है। नगरीय आबादी में बढ़ोत्तरी बताती है, कि बड़े नगर, खासतौर पर क्लास-1 नगर, काफी तेजी से विकास कर रहे हैं, जिससे इस तथ्य को नहीं नकारा जा सकता कि 1951 में जिन शहरी इलाकों की जनसंख्या मात्र 33.71% थी, वह 2011 में बढ़कर 60% हो गई है। इसके अतिरिक्त, क्लास-1 श्रेणी के शहर1991 में 14 से बढ़करा 2001 में 54 हो गए थें, जो 2011 में बढ़कर 64 हो चुके हैं, जबकि मेट्रोपॉलिटन सिटी की संख्या 06 (2001 में) से बढ़कर 07 (2011 में) हो गई है। इस तरह से बढ़ते शहरीकरण को देखकर लगता है की शहरों में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। छोटे शहर (खासतौर पर क्लास-5 और क्लास-6 के) में अभी तक नकरात्मक बढ़ोत्तरी देखने को मिली है।

इस तरह का अनुकूल महौल यह साफ दर्शाता है कि प्रदेश में बड़े शहरों की ओर शहरीकरण काफी तेजी से विकास कर रहा है। परिणामस्वरूप, देश के विभिन्न राज्यों से लोग उत्तर प्रदेश में पलायन कर रहे हैं, और रोजगार के अवसरों का फायदा उठा रहे हैं। प्रदेश में शहरीकरण एक उचित दिशा में अग्रसर है, जिससे काफी तेजी से विकास हो रहा है, आर्थिक क्षमताओं और रोजगार कमाने के और भी अवसर प्रदान करता है। इसलिए, शहरीकरण के चलते ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरों में अधिक रोजगार बढ़ रहा है, साथ ही इससे शहरों का आर्थिक सुधार भी संभव हो सकता है।

नगर आवासीय एवं इंफ्रास्ट्रक्चर सेनेरियो

शहरी आवास

आवास जीवन यापन हेतु एक मूल और सबसे अधिक जरूरी चीज है। “आवास” का मतलब सिर्फ एक छत से कहीं ज्यादा होता है, जिसमें पर्याप्त जगह, नागरिक सुविधाएं, सुरक्षा, स्ट्रक्टरल स्थिरता, बिजली, पानी, हवा, निजिता, काम करने की जगह और भी ऐसी कई सुविधाएं प्राप्त की जा सकती है। किसी आवास की सिर्फ आर्थिक महत्ता नहीं होती है, बल्कि वहां रहने योग्य, समावेशकता और स्थिरता भी महत्वपूर्ण होती है। शहरी गरीब के लिए उचित आवास, राज्य का एक सामाजिक दायित्व है और साथ ही एक बहुत बड़ी चुनौती भी है, जिसमें विकासशील सोच और योजना की जरूरत पड़ती है।

उचित आवास की कमी एक बहुत बड़ी समस्या है, जो न सिर्फ उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में है, बल्कि पूरे देश में बहुत बड़ी समस्या है। बड़े स्तर पर शहरीकरण होने के कारण, आवासीय योजना में बड़े स्तर का निवेश, भौतिक और सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यक्ता होती है। ऐसा अनुमानित है कि, देश में आवासीय उद्योग देश के जीडीपी में 6% योगदान देता है। इस उद्योग में सहायक उद्योगों के साथ 250 बैकवर्ड और फॉरवर्ड लिकेंज भी है। यह विडंबना है कि शहरी आबादी तेजी से बढ़ने के बावजूद, सर्विस्ड भूमि और आवास इकाइयों की आपूर्ति प्रतिबंधित है, जिसके कारण उप-मानक और अवैध आवास स्टॉक का सृजन हो रहा है। 12वीं पांच वर्षीय योजना (2012-17) की शुरुआत में 5.46 लाख आवास इकाइयों की कमी अनुमानित थी, और अनुमानित जनसंख्या के अनुसार 12वीं पंच वर्षीय योजना के अंत तक 13.20 लाख आवासीय इकाइयों को बनाने का अपेक्षित है। इसके अतिरिक्त, अनुपयोगी कच्चे आवासों की जरूरतों, बढ़ती आबादी के जरूरत और अप्रचलन कारक की जरूरतें क्रमशः 0.099 लाख, 2.06 लाख और 3.30 लाख है। इस प्रकार, 12वी पंच वर्षीय योजना के समय अनुमानित आवासीय जरूरते, 24.119 लाख है, जिसके मतलब यह है कि प्रति वर्ष 4.8 लाख आवासीय इकाइयां प्रदान करनी होगी।

भैतिक इंफ्रास्ट्रक्चर

बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर के स्तर के विश्लेषण के चलते राज्य के शहरी क्षेत्रों के असली स्थिति अब सामने आयी है। बढ़ते शहरीकरण के चलते, स्लम क्षेत्रों की भी बढ़ोत्तरी हुई है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के अनुमान के अनुसार, 1991 में उत्तर प्रदेश के स्लम क्षेत्रों में 58.4 लाख जनसंख्या थी, जो 2011 में बढ़कर 77.10 लाख हो गई और 2011 के आते-आते यह आबादी 1.02 करोड़ तक पहुंच गई, जो उत्तर प्रदेश की 2011 की जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या का 23.05% है। इसके चलते शहरी इंफ्रस्ट्रक्चर प्रणाली पर काफी अधिक भार है, जैसे ड्रेनेज, सीवरेज, सॉलिड वेस्ट प्रबंधन और पानी आपूर्ति जैसी सेवाओं में। जल आपूर्ति कनेक्शन नगर निगम टाउन में केवल 50% घरों के पास उपलब्ध है और बाकी 41% जल आपूर्ति गैर-राजस्व है, अर्थात वो लीकेज के तौर पर बर्बाद जा रहा है। केवल 20% नगरीय क्षेत्रों को सीवरेज प्रणाली के तहत सर्विस प्रदान की जाती है और 73% घरों में शौचालय सुविधा उपलब्ध है। केवल 58% नगरीय केंद्र ऐसे हैं जहां तूफान के पानी की निकासी जैसी सुविधा उपलब्ध है और मात्र 88% सॉलिड वेस्ट ही कलेक्ट किया जाता है। किसी भी शहर में एकीकृत ड्रेनेज और सॉलिड वेस्ट प्रबंधन प्रणाली नहीं उपलब्ध है। इसलिए, सबसे बड़ी चुनौती यह है की, शहरी नागरिकों को मूलभूत सेवाएं और मूलभूत आवासीय सेवा प्रदान करायी जाए, जो कि उचित लागत पर हो। मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर परिदृश्य को ठीक करने के लिए मौजूदी नीतियों, नियम और विनियमों का विश्लेषण किया जाना भी जरूरी है और विकासशील नीतियों और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को बढ़ावा दिया जाना भी जरूरी है, ताकि उचित आवास और इंफ्रास्ट्रक्चर का प्रावधान किया जा सके।

शहरी परिवहन

उत्तर प्रदेश के ज्यादातर शहरों में शहरी परिवहन की दिक्कतें देखने को मिलती है, जो काफी वर्षों से चली आ रही है। इस समस्या से लोगो के आवागमन और शहरी क्षेत्रों के आर्थिक विकास पर भी काफी प्रभाव पड़ा है। इन समस्याओं का प्रमुख कारण, अपर्याप्त परिवहन इंफ्रास्ट्रक्चर और उसका सब-ऑप्टिमल इस्तेमाल है। साथ ही भूमि उपयोग और परिवहन नियोजन के बीच एकीकरण की कमी और बड़े स्तर पर ट्रांसपोर्ट प्रणाली में कमी और शहरी बस सेवा को बेहतर बनाने में कमी के चलते हो रहा है। उचित दर पर बेहतर बस परिवहन प्रणाली प्रदान करना एक चुनौती है। इसके अतिरिक्त यह भी जरूरी है कि वैकल्पिक सार्वजनिक परिवहन तकनीकि सेवाएं भी ढूंढा जाए। सार्वजनिक परिवहन विकल्प कम दर बसों और उच्च दर की रेल मेट्रों के बीच अंतर है। इसके अतिरिक्त, उचित ट्रांसपोर्ट मोड को चुनने के लिए शहर का आकार भी काफी जरूरी माना गया है और सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को शुरु करने और उसे कार्यन्वयन करने में क्षमता वृद्धि एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस संबंध में बहुत सी पहल शुरु करी गई है। प्रदेश के लखनऊ, कानपुर, आगरा, इलाहाबाद, वाराणसी और मेरठ जैसे शहरों द्वारा व्यापक गतिशील योजनाओं को तैयार किया गया। बेहतर बसों, बेहतर सूचना प्रणाली और संबंधित बस लेन से बस चलन की प्राथमिकताओं के चलते जेएनएनयूआरएम के तहत बस प्रणालियों को बेहतर बनाया गया है। हालांकि, शहर की जरूरतों को पूरा करने के लिए यह अभी भी पर्याप्त नहीं है। राज्य में शहरी परिवहन सेक्टर को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि प्रस्तावित दृष्टिकोण व्यापक होना चाहिए और मानव जीवन की कई जरूरतों को पूरा करना चाहिए।

उक्त मानव जरूरतों को ध्यान में रखते हुए, प्रदेश सरकार ने यह फैसला लिया है कि लखनऊ और गाजियाबाद में प्रथम चरण में मेट्रो रेल सेवा को स्थापित किया जाए। वर्तमान समय में दोनो जगहों पर मेट्रो रेल का कार्य प्रगति पर है। उचित रिपोर्ट के बाद, आरआईटीईएस (रेल मंत्रालय का एक विशेष संस्थान) द्वारा डीपीआर भी बनाई चा चुकी है, जिससे वाराणसी, कानपुर नगर, आगरा और मेरठ में मेट्रो रेल परियोजनाओं को कार्यन्वयन किया जा सके। कानपुर रेल मेट्रो हेतु डीपीआर सरकार द्वारा प्राप्त कर लिया गया है। कानपुर मेट्रो रेल और वाराणसी मेट्रो रेल परियोजनाएं, वित्तीय वर्ष 2016-17 में शुरु होने की संभावनाएं हैं। प्रदेश में बढ़ रहे शहरीकरण के चलते प्रदेश में होनी वाली समस्याओं में बढ़ती स्लम आबादी, पर्याप्त आवास की कमी, पीने योग्य पानी की सुविधा में कमी, पर्यावरणीय समस्याएं जैसे हवा, पानी और ध्वनि प्रदूषण, स्वच्छता की कमी, भूमि पर बढ़ता दबाव, अतिक्रमण, अनियमित शहरी विका और परिवहन की समस्याएं आदि भी शामिल हैं। यद्यपि शहरी स्थानीय निकायों को अपने कार्यों का निर्वहन करने के लिए संसाधनों को जुटाने के लिए काफी मेहनत करी जा रही है, पर फिर भी तेजी से बढ़ रही आबादी (खासतौर पर बड़े शहरों में) को स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल आपूर्ति, स्वच्छता, ड्रेनेज, सीवरेज, स्ट्रीट-लाईट, रोड आदि सुविधाओं को देने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इन सारी समस्याओं के निवारण हेतु, इनकी क्षमता वर्धन करना जरूरी है और साथ ही आधुनिक तकनीक को सुदृढ़ बनाना होगा और शहरों की बढ़ती जरूरतों को पूरा करना होगा।