इतिहास और पृष्ठभूमि

नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग की स्थापना शासनादेश संख्या 10201_R/XII C_D_579/48 दिनांक नवंबर 30,1948 को हुई थी, जो विभागों के लिए बहुत से कार्य करता है। शुरुआती दौर में, विभाग का कार्य मात्र बतौर सलाहकार तक सीमित था। नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में नियोजित विकास से संबंधित जागरुकता संबंधित कार्य तथा, शहरों में बढ़ रही आबादी, और अनियमित विकास और सामुदायिक समस्या को देखते हुए, लोगों में जागरुकता बढ़ायी। अधिक घनत्व और स्लम क्षेत्रों में सरकार द्वारा इस विभाग के कार्यों को बढ़ावा देने के लिए लाया गया, जिससे सलहाकार के रूप में यह विभाग लोगों की भलाई के लिए कार्यरत हो सके। शुरुआती चरण में, यह विभाग लेआउट तैयार करने की ओर ज्यादा अग्रसर था। स्ट्रीट प्लानिंग और इमारतों की डिजाईनिंग या कभी-कभी पर्यावरण की बेहतरी के लिए काम भी करता था, पर बाद में यह अहसास हुआ की नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग का क्षेत्र काफी बड़ा है, क्योंकि इसके अंतर्गत शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों दोनो का बड़े स्तर पर विकास हो सकता है।

आगे निश्चित मानदंडों को बताने से पहले, नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग का अच्छी तरह से विवरण दे दिया जाए, इसके कार्यक्षेत्र, लक्ष्यों और विभिन्न पहलुओं को समझा दिया जाए, ताकी संस्था के कार्यों के मानदंडों को सही दिशा में समझा जा सके। इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए, निम्न पैराग्राफ में उक्त जानकारी/सूचना को बताया गया है, जो विभाग के दशकों के कार्य, समय-समय पर भारत सरकार या नगरीय नियोजन (भारत) या अन्य संस्थाओं (जो इस क्षेत्र से संबंधित है) द्वारा दी गई विभिन्न संस्तुतियों के आधार पर और बेहतर अनुभव पर आधारित है।

नगर एवं ग्राम नियोजन की आवश्यक्ता

नगर एवं ग्राम नियोजन, हमारे देश में एक नए प्रकार के कार्य का उदाहरण है, और इसकी प्रगतिशीलता को देखने के लिए इसके द्वारा किए गए शहरीकरण का उदाहरण लिया जा सकता है, जो मानव इतिहास में सबसे नवीन उदाहरण है। इसके आधुनीकरण का यही एक उदाहरण है की इसके विकास की दर या क्षमता इतनी अधिक है की इसका अभी तक पूरी तरह से समझा या अनुभव नहीं किया जा सका है। मानव समाज में नगरीकरण में बड़े स्तर पर हो रहे परिवर्तन को साफ तौर पर अनुभव किया जा सकता है। यह बदलाव और विकास का एक अहम हिस्सा माना जाता है। नगरीकरण के विकास का जिस स्तर पर वर्तमान समय में अनुभव किया जा सकता है, आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ है। नगरीय एग्रीगेशन में नागरिकों के अधिक से अधिक अनुपात का ध्यान, पूरे अर्थ और सामाजिक विकास पर होता है। इसलिए मानव जनसंख्या पहलू का लक्ष्य यह नहीं है की वो एक संकीर्ण रुचि में बंध कर रह जाए, बल्कि एक नए निर्धारित और विकासशील सोच और रुचि की ओर अग्रसर हो। इस संदर्भ में नगरीकरण के विकास हेतु एक विचाराधीन और प्रगतिशाली सोच की जरूरत है। सामाजिक और आर्थिक माहोल में बदलाव करने पर कई सारी समस्याएं भी पैदा होंगी, जिससे नगरीय विकास के परिणाम दीर्धकालीन होंगे, जैसे- शहरों से पलायन कर आए अंगिनत लोगों का निस्तारण। इसके अतिरिक्त ट्रैफिक संबंधित समस्याएं, वायु प्रदूषण, कृषि कार्यों, पानी की किल्लत और संसाधनों के नुकसान आदि जैसी समस्याएं भी उत्पन्न होंगी। शहरीकरण की यह प्रक्रिया इतनी अच्छी और बेहतर तरीके से आर्थिक विकास से जुड़ी हुई है, जिससे बिना शर्त उसका विकास संभव है। इसलिए हमें कुछ ऐसे उपाय ढूंढने होंगे जिससे की इन समस्याओं का हल निकाला जा सके और किसी के जीवन पर या शहरीकरण पर भी इसका प्रभाव न पड़े। टाउन प्लानिंग ने इन सारी प्रक्रियाओं को सरकार को सौंप दिया है, जिससे की नगर और ग्रामों की योजना में उपयुक्त और प्रभावी उपाय निकाले जा सकें और वर्तमान और भविष्य की आबादी को एक बेहतर जीवन यापन के लिए सभी प्रकार की सुविधाएं मुहिया करायी जा सकें और एक स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण बनाया जा सके।

ऐसा समाज बनाने के लिए सरकार भी खास कदम उठा रही है, जिससे की जनता को एक बेहतर सामाजिक जिंदगी देने के लिए सामाजिक सुविधाएं मुहिया करायी जा सकें, और समाज के लोकतांत्रिक और समाजवादी पैटर्न में टाउन प्लानर्स का काम भी काफी महत्वपूर्ण हो गया है। नगर और ग्राम भी समाज का एक जीवित अंग है, जो एकीकृत सामाजिक संबंधों का एक बेहतर प्रतीक भी है। हमारा समाज लोगों से ही बना है और समाज लोगों की सामाजिक, सांसकृतिक और आध्यात्मिक जरूरतों के लिए ही बना है, जिससे लोगों की जरूरतें पूरी होती हैं और इनको एक बेहतर जीवन और जिंदगी प्रदान करता है।